मुख्य बिंदु
- श्रीलंका ने ईरान से जारी युद्ध में अपनी तटस्थता बनाए रखने के लिए अमेरिका के लड़ाकू विमानों को देश में उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।
- अमेरिकी दो फाइटर जेट्स, जो 8 एंटी-शिप मिसाइलों से लैस थे, उन्हें मार्च की शुरुआत में मट्टला इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरने की अनुमति मांगी गई थी।
- श्रीलंकाई राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में इस फैसले की घोषणा की, इसे राष्ट्रीय संप्रभुता और शांति का प्रतीक बताया।
- पूर्व विदेश मंत्री अली साबरी ने इस फैसले को ‘गर्व की बात’ बताते हुए कहा कि छोटे देशों को बड़ी ताकतों के झगड़ों में नहीं पड़ना चाहिए।
2024 में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहाँ श्रीलंका ने अमेरिका को एक स्पष्ट संदेश देते हुए अपने देश में अमेरिकी फाइटर जेट उतारने की इजाजत देने से साफ इनकार कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। श्रीलंकाई राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने अपनी संसद को बताया कि उन्होंने इस युद्ध में तटस्थ रहने के देश के फैसले पर अडिग रहते हुए अमेरिकी अनुरोध को ठुकरा दिया है। यह कदम श्रीलंका की स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है और विश्व मंच पर उसकी एक मजबूत पहचान स्थापित करता है।
श्रीलंका ने अमेरिकी फाइटर जेट्स को अपने देश में उतारने से क्यों रोका?
हाल ही में श्रीलंका ने अमेरिका को बड़ा झटका देते हुए उसके फाइटर जेट्स को अपनी जमीन पर उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने 20 मार्च को संसद को बताया कि अमेरिका जिबूती (Djibouti) में अपने बेस से दो लड़ाकू विमान लाना चाहता था। इन विमानों में 8 एंटी-शिप मिसाइलें लगी थीं और अमेरिका इन्हें मार्च की शुरुआत में मट्टला इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Mattala International Airport) पर उतारना चाहता था।

हालांकि, श्रीलंका ने साफ मना कर दिया। राष्ट्रपति दिसानायके के अनुसार, श्रीलंका इस युद्ध में तटस्थ रहने के अपने फैसले पर कायम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश किसी भी कीमत पर अपनी तटस्थता का उल्लंघन नहीं करेगा और किसी भी बड़ी शक्ति को अपनी भूमि का उपयोग करने की अनुमति नहीं देगा, खासकर जब वह किसी संघर्ष में शामिल हो। इससे पहले स्पेन और तुर्किए ने भी अमेरिका को युद्ध के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल करने की इजाजत देने से साफ इनकार कर दिया था, जो श्रीलंका के इस फैसले को एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ देता है।
तटस्थता की नीति: दबाव के बावजूद अडिग श्रीलंका
राष्ट्रपति दिसानायके ने इस बात पर जोर दिया कि उनके देश पर तमाम तरह के दबाव हैं, लेकिन ईरान और इजरायल-अमेरिका में छिड़े युद्ध में वो अपनी तटस्थता बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि मिडिल ईस्ट एशिया में जंग के हालात से उनके देश में भी चुनौतियाँ बढ़ी हैं, लेकिन वे हार नहीं मानेंगे और न्यूट्रल (तटस्थ) रहने की हर संभव कोशिश करेंगे। श्रीलंका की यह नीति उसकी संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को दर्शाती है।
यह फैसला दिखाता है कि छोटे देश भी बड़े देशों के दबाव में आए बिना अपनी विदेश नीति के सिद्धांतों पर टिके रह सकते हैं। श्रीलंका अपनी तटस्थता को अपने दीर्घकालिक अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण मानता है।
अमेरिकी विशेष दूत से मुलाकात और फिर यह फैसला
दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रपति दिसानायके ने यह बयान देने से ठीक एक दिन पहले दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिका के स्पेशल दूत सर्जियो गोर से मुलाकात की थी। इस मीटिंग के बाद जो बयान जारी किया गया था, उसमें कहा गया कि दोनों नेताओं के बीच समुद्री रास्तों और बंदरगाहों की सेफ्टी को लेकर चर्चा हुई। इसके अलावा, श्रीलंका और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों को मजबूत करने पर भी अच्छी बातचीत हुई।
इस मुलाकात के तुरंत बाद राष्ट्रपति का संसद में यह खुलासा करना कि उन्होंने अमेरिकी फाइटर जेट्स को उतरने से मना कर दिया, यह दर्शाता है कि श्रीलंका अपनी कूटनीति को बहुत सावधानी से संभाल रहा है। वह अमेरिका के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता और तटस्थता के सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करेगा।
पूर्व विदेश मंत्री अली साबरी ने सराहा फैसला
राष्ट्रपति दिसानायके के इस फैसले को श्रीलंका के पूर्व विदेश मंत्री अली साबरी ने ‘गर्व की बात’ कहा है। इंडिया टुडे से खास बातचीत में अली साबरी ने कहा कि उन्हें अपने राष्ट्रपति पर गर्व है। उन्होंने एकदम सही फैसला लिया है। साबरी ने जोर दिया कि छोटे देशों को बड़े देशों के झगड़े में नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि ये लड़ाइयाँ हमारी नहीं हैं।
साबरी ने कहा कि श्रीलंका एक स्वतंत्र देश है और इसलिए अमेरिका चाहे कितना ही ताकतवर क्यों न हो, राष्ट्रपति दिसानायके ने जो फैसला किया है वह बिल्कुल सही है। उनका यह बयान राष्ट्रीय एकता और कूटनीतिक दूरदर्शिता का प्रतीक है। यह फैसला श्रीलंका के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है।
कूटनीति और शांति का संदेश
साबरी ने आगे कहा कि युद्ध के समय श्रीलंका हमेशा तटस्थ रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि लड़ाई की जगह कूटनीतिक बातचीत से हर मसला सुलझाना चाहिए। उन्होंने डॉनल्ड ट्रंप, बेंजामिन नेतन्याहू और ईरान के सुप्रीम लीडर को संदेश दिया कि हर समस्या बातचीत और समझौते से हल हो सकती है। युद्ध कोई समाधान नहीं है।
यह संदेश न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है। श्रीलंका जैसे छोटे देश की ओर से शांति और संवाद का आह्वान अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण आवाज बन सकता है।
हिंद महासागर में श्रीलंका की तटस्थता का लंबा इतिहास
श्रीलंका ने इससे पहले भी हिंद महासागर में अपनी तटस्थता और मानवीय दृष्टिकोण का प्रदर्शन किया है। अमेरिका के हमले में नष्ट किए गए एक ईरानी जहाज के नाविकों को बचाने के लिए श्रीलंका ने अभियान चलाया था। 4 मार्च को अमेरिका ने श्रीलंका के दक्षिणी शहर गॉल के पास ईरानी फ्रिगेट आइरिस DENA पर हमला किया था, जिसमें 84 नाविकों की मौत हो गई थी और 32 नाविकों को बचा लिया गया था।
यह जहाज भारत से सैन्य अभ्यास के बाद विशाखापत्तनम से ईरान लौट रहा था। इस घटना के दो दिन बाद एक दूसरे ईरानी जहाज आइरिस बुशहर को श्रीलंका ने 219 नाविकों के साथ शरण दी थी। ये घटनाएँ श्रीलंका की तटस्थ नीति और मानवीय सहायता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करती हैं। यह दिखाता है कि श्रीलंका अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानवीय मूल्यों का सम्मान करता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
श्रीलंका ने अमेरिकी फाइटर जेट्स को उतरने की अनुमति क्यों नहीं दी?
श्रीलंका ने ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध में अपनी तटस्थता बनाए रखने के लिए अमेरिकी फाइटर जेट्स को अपने देश में उतरने की अनुमति नहीं दी। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने स्पष्ट किया कि देश किसी भी संघर्ष में किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करेगा।
अमेरिकी फाइटर जेट्स में क्या खास था?
अमेरिका के जो दो फाइटर जेट श्रीलंका में उतरना चाहते थे, वे 8 एंटी-शिप मिसाइलों से लैस थे। ये विमान जिबूती में अमेरिकी बेस से आ रहे थे और मट्टला इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरना चाहते थे।
श्रीलंका के इस फैसले पर पूर्व विदेश मंत्री अली साबरी की क्या प्रतिक्रिया थी?
पूर्व विदेश मंत्री अली साबरी ने इस फैसले को ‘गर्व की बात’ बताया। उन्होंने कहा कि उन्हें अपने राष्ट्रपति पर गर्व है और यह छोटे देशों के लिए सही फैसला है कि वे बड़ी ताकतों के झगड़ों में न पड़ें।
श्रीलंका ने पहले भी तटस्थता का परिचय कब दिया है?
हां, श्रीलंका ने पहले भी हिंद महासागर में अमेरिकी हमले में नष्ट हुए एक ईरानी जहाज के नाविकों को बचाने और एक दूसरे ईरानी जहाज (आइरिस बुशहर) को 219 नाविकों के साथ शरण देकर अपनी तटस्थता और मानवीय मूल्यों का प्रदर्शन किया है।